जैन साध्वी ज्ञानमती माताजी ने किया केशलोच, बोलीं यह आंतरिक समर्पण और त्याग का प्रतीक

पटना। जैन समाज की सुप्रसिद्ध तपस्विनी साध्वी ज्ञानमती माताजी ने 2 अप्रैल को भगवान ऋषभदेव दिगम्बर जैन मंदिर में विधिपूर्वक केशलोच संपन्न किया। यह धार्मिक अनुष्ठान जैन धर्म की कठिनतम साधनाओं में से एक है, जिसे आत्मसंयम, वैराग्य और तपस्या का प्रतीक माना जाता है।

प्रातःकाल भव्य केशलोच से पूर्व भगवान ऋषभदेव की 31 फीट ऊंची प्रतिमा का मस्तकाभिषेक सम्पन्न किया गया एवं विश्वशांति की कामना के लिए भगवान के मस्तक पर शांतिधारा सम्पन्न की गई। इसके बाद वरिष्ठ जैन साध्वी गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी ने अपने हाथों से अपने केशों को उखाड़ा। साध्वी ज्ञानमती माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि केशलोच केवल बाह्य कर्म नहीं, बल्कि आंतरिक समर्पण और त्याग का प्रतीक है। उन्होंने श्रद्धालुओं को अहिंसा, अपरिग्रह और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। प्रतिष्ठाचार्य विजय जैन जी ने बताया कि जैन ग्रंथ के अनुसार दिगम्बर साधु साध्वियों को साल में 3 बार यह प्रक्रिया प्रत्येक 4 माह में करनी होती है। यह धार्मिक अनुष्ठान जैन धर्म की कठिनतम साधनाओं में से एक मानी जाती है, जिसे आत्मसंयम, वैराग्य और तपस्या का प्रतीक माना जाता है।

विजय जैन ने बताया कि दिगम्बर जैन साधु एवं साध्वियों को दीक्षा के पश्चात् अपने हाथों से अपने केशों को निकालना होता है जिसे शरीर से निर्ममता का प्रतीक समझा जाता है। जिस दिन जैन साधु अपने केश अपने हाथों से निकालते हैं उस दिन वे निर्जला उपवास करते हैं। परमपूज्य गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी 73 वर्ष से संयम की आराधना से जीवन यापन कर रही हैं। त्याग की प्रतिमूर्ति महासाधिका विदुषी संत ज्ञानमती माताजी ने 550 से अधिक ग्रंथों का सर्जन अपनी लेखनी से किया है। केशलोच साधु की मुख्य क्रिया है। मौके पर पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने बताया कि प्रत्येक जैन साधु को प्रत्येक 3-4 माह में यह प्रक्रिया करना अनिवार्य होता है। साधु बनने के पूर्व सबसे पहले केशलोच करना होता है उसके पश्चात् ही उनके मस्तक पर संस्कार गुरु के द्वारा किए जाते हैं जिससे वह दीक्षा ग्रहण करते हैं। यह अपने आप में एक कठोर तपश्चरण है। एम पी जैन ने बताया कि इस अवसर पर पटना के जैन श्रद्धालु उपस्थित थे।

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Author: undekhilive

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