
जैन समाज के एम पी जैन ने बताया कि पर्युषण पर्व के अंतिम दिन आज ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा की गयी। आज पटना के मीठापुर, कदमकुआँ, मुरादपुर, कमलदह मंदिर गुलजार बाग सहित सभी दिगम्बर जैन मंदिरों में ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा की गयी। सभी दिगम्बर जैन मंदिरों में सुबह से हीं पूजा करने हेतु श्रद्धालु मंदिरों में पहुँचने लगे। मंदिरों में श्रद्धालुओं ने भगवान् का अभिषेक किया एवं शांतिधारा के बाद ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा की गयी।
एम पी जैन ने बताया कि मीठापुर दिगम्बर जैन मंदिर में ब्रह्मचारी सुमत भैया एवं श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, कदमकुआं में पण्डित डॉ शीतल जैन शहस्त्री ने श्रद्धालुओं को उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा करवाई। ब्रह्मचारी जी ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि ब्रह्मचर्य व्रत अनंत गुण भर देता है। तीनों लोको में पूज्य है। ब्रह्मचारी व्यक्ति की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है। किसी भी व्रत को करने के लिए सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना आवश्यक होता है। पर्वों के दिनों में हम संकल्प लेते हैं कि सम्पूर्ण पर्व भर हम ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करेगें। कितने भी जीरो लिख लें लेकिन बिना संख्या के लिखे वह जीरो शुन्य के समान है। उसी प्रकार से ब्रह्मचर्य व्रत संख्या के समान है जो अनंत गुण व्यक्ति में विद्यमान कर देता है। ब्रह्मचारी व्यक्ति को अनेक रिद्धि सिद्धियॉं प्रगट हो जाती हैं। ब्रह्मचारी व्यक्ति से कुशक्तियॉं, बुराईयॉं पास आने में भय खाती हैं। ब्रह्मचर्य व्रत तीनों लोको में सर्वथा पूज्य है। ब्रह्मचर्य व्रत हीरे के समान है। कदमकुआं दिगम्बर जैन मंदिर में पंडित डॉ शीतल जैन शास्त्री ने श्रद्धालुओं को बताया कि ब्रह्मचारी व्यक्ति का कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता है। त्रैलोक्य मंडल विधान के अंतर्गत सिद्ध शिला पर विराजमान सिद्धों की पूजा की गई। सौधर्मइंद्र के द्वारा मंडल पर अर्घ्य समर्पित किये गये।
शास्त्री जी ने बताया कि ब्रह्मचर्य शब्द का अर्थ है संसार के इन्द्रियों के विषय और कषायों(बुरी आदतें) के , साथ तन के राग का त्याग कर अपनी ब्रह्म स्वरुप आत्मा में रमण करना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म है। ब्रह्म स्वरुप आत्मा की चर्या का नाम ब्रह्मचर्य है। आत्मिक सुख भोगना ,प्रसन्न रहना ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य धर्म के पालन से शरीर ढृढ़ एवं ज्ञान की वृद्धि होती है। वासनाओं में लीन मनुष्य धर्म के तत्व को नहीं पहचान पाता है। काम वासना पर विजय प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य है। सामान्य व्यक्ति अपने जीवन से काम और वासना को निर्मूल नहीं कर पाता है। मुनि एवं तपस्वी काम और वासना को निर्मूल कर उग्र ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करते है। जब कोई साधक क्रोध, मान, माया, लोभ एवं पर-पदार्थों का त्याग आदि करते हैं और पर-पदार्थों से संबंध टूट जाने से जीव का अपनी आत्मा (जिसे ब्रह्म कहा जाता है) में ही रमण होने लगता है। इसे ही ‘उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म’ कहा जाता है। यही धर्म के दश लक्षण हैं, जो पर्युषण पर्व के रूप में आकर हमें सुख-शांति का संदेश देते हैं।
आज 10 दिवसीय पर्युषण पर्व की समाप्ति पर मंदिरों में हवन कर के हुई। सैकड़ों की संख्या में उपस्थित जैन श्रावकों ने शांति की कामना की।
आज जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर भगवान बासुपूज्य के निर्वाण के अवसर पर श्रावकों द्वारा भगवान का 108 कलशों से अभिषेक किया गया। साथ ही साथ भगवान को निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। सभी श्रावकों ने भगवान को लाडू चढ़ाये।
एम पी जैन ने बताया कि पर्युषण पर्व की समाप्ति क्षमावाणी पर्व के साथ होती है।






