नियम, निष्ठा, संयम, विश्वास एवं प्रेम का प्रतीक है यह व्रत
18 जुलाई से 31 जुलाई तक विधिपूर्वक मनाया जायेगा
सम्यक न्यूज़, पटना.
सुहाग की रक्षा और उनके सुदीर्घ जीवन की कामना से नवविवाहित सुहागिनों का मधुश्रावणी व्रत सावन कृष्ण पक्ष पंचमी से शुरू हो गया है. इस वर्ष मधुश्रावणी पूजन की शुरुआत 18 जुलाई से नागपंचमी पर विधिपूर्वक शिव-पार्वती एवं नाग देवता की पूजा से हुई है. मिथिलांचल की बेटियों के लिए शादी के पहले साल के सावन का खास महत्व है. खास बात यह है कि मधुश्रावणी पर्व जीवन में सिर्फ एक बार शादी के पहले सावन में खूब धूम-धाम से मनाया जाता है. इस पर्व को नवविवाहिताएं अपने मायके में मनाती हैं. इस दौरान उनका श्रद्धा एवं विश्वास देखते ही बनता है. सावन महीने वे 14 दिनों तक नियम, निष्ठा, संयम, विश्वास एवं प्रेम के प्रतीक इस मधुश्रावणी व्रत को करती हैं. इस अवधि में वे बिना नामक के भोजन ग्रहण करती हैं और जमीन पर सोती हैं.
पंडित संजीत मिश्रा बताते हैं कि लगभग दो सप्ताह तक चलनेवाले इस पर्व के लिए नवविवाहिता के ससुराल से पूजन सामग्री आती है. इस दौरान नवविवाहिता अपने ससुराल से आये अन्न, मिष्टान्न आदि भोजन के रूप में ग्रहण करती है. हर दिन संध्या बेला में नव विवाहिताएं अपनी सखियों के साथ बटगवनी गाते हुए फूल लोढ़ने (तोड़ने) जाती हैं. डाला में रंग-बिरंगे फूल और पत्ते सजाती हैं. पूजा के लिए रोज बासी फूलों और पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है. इन्हीं फूल-पत्तों के साथ वे घर पर विधि-विधान से मधुश्रावणी की पूजा करती हैं. मधुश्रावणी पूजन पर मैथिल ललनाओं द्वारा भक्तिगीतों के गायन से पूरा वातावरण गुंजायमान हो जाता है. देवी गीत, नचारी आदि भक्तिगीतों का गायन विशेष रूप से होता है. जैसे- आयल हे सखि सर्व सोहाओन, साओन केर महिनमा…ठांओं कयलहुं अरिपन देलहुं, लीखल नाग-नगिनियां… बलमु संग गौरी पूजब हे, पीयर वन हम जायब फूल लोढ़ब हे… लाबा दूध देबनि छिड़ियाई, दीप जरय अहिताब केर, जुग-जुग सोहागिन रहथू पबनैतिन…

व्रत के पहले दिन फलाहार किया जाता है. यह पूजा लगातार 14 दिनों तक चलती है. इन दिनों सुहागन व्रत रखकर मिट्टी और गोबर से बने विषहारा और गौरीशंकर की विशेष पूजा कर कथा सुनती हैं. कथा की शुरुआत विषहारा के जन्म और राजा श्रीकर से होती है. कथा सुनते वक्त एक ही साड़ी हर दिन पहनती हैं. पूजा स्थान पर रंगोली बनाई जाती है. फिर नाग नागिन, विषहारा पर फूल पत्ते चढ़ाकर पूजा करती हैं. महिलाएं गीत गाती हैं. कथा पढ़ती और सुनती हैं. पूजा शुरू होने से पहले नाग-नागिन और उनके पांच बच्चों को मिट्टी से बनाया जाता है. हल्दी से गौरी बनाने की परंपरा शुरू की जाती है. इस त्योहार में प्रकृति की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है. मिट्टी और हरियाली से जुड़ी इस पूजा के पीछे पति की लंबी आयु की कामना होती है. इस पर्व के दौरान मैथिली लोकगीत की आवाज हर नवविवाहिताओं के घरों से सुनाई देती है. हर शाम महिलाएं आरती करती हैं और गीत गाती हैं.
मधुश्रावणी पर्व के समापन के दिन नव-विवाहिताएं ससुराल से आयी नयी साड़ी, गहने, श्रृंगार आदि के सामान से सुसज्जित होकर पूजा पर बैठती हैं. उनके साथ उनके दूल्हा भी पूजा पर बैठते हैं. मधुश्रावणी पूजन कार्यक्रम की एक और खासियत है कि इसमें पूजा के सभी विधान महिला पंडित द्वारा ही संपादित कराए जाते हैं. समापन के दिन सगे-संबंधियों और मित्रों को विशेष पकवान खिलाए जाते हैं.
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