“राजनीति में सब कुछ चलता है” वाला युग बीत गया
श्यामनंदन कुमार, पटना.
कहा जाता है “शब्दों का भी अपने स्वाद होता है. इसलिए बोलने से पहले उसे चख लेना चाहिए.” ज्ञानीजन का भी कहना है कि कुछ भी बोलने से पहले उसे ह्रदय के तराजू पर तौल लेना चाहिए. यह भी कि जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते. लेकिन आजकल जैसे कुएं में ही भंग पड़ गयी है. ये नशा हमारे कुछ माननीयों पर ज्यादा ही चढ़ गया है. लोकतंत्र में जनता जिन्हें वोट देकर कुर्सी पर बैठाती है या अपना प्रतिनिधि चुनती है, वे अक्सर अपनी वाणी पर संयम नहीं रख पाते हैं. कहीं भी कुछ भी बोल देते हैं. क्या ऐसे माननीय इस बात से अनजान हैं ये डिजिटल मीडिया का युग है सब कुछ रिकॉर्ड हो रहा है जिसे वर्षों बाद भी टीवी, मोबाइल या कंप्यूटर पर सब कुछ देखा जा सकता है जिससे आप शर्मिंदा भी हो सकते हैं.
ताज़ा मामला देश के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से जुड़ा है. बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने “राजनीतिक मर्यादा” को लांघते हुए कल कह दिया कि “हमें राष्ट्रपति भवन में कोई मूर्ति नहीं चाहिए.” ऐसा क्यों कहा तेजस्वी ने? क्या श्रीमती द्रौपदी मुर्मू कोई मूर्ति हैं या 25 जुलाई को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद वे पाषाण प्रतिमा हो जाएँगी? रबर स्टाम्प हो जाएँगी? श्रीमती द्रौपदी मुर्मू लम्बे समय तक विधायक, मंत्री और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर रह चुकी हैं. वे एक मेहनती, लगनशील, कर्मठ और जुझारू महिला हैं. तेजस्वी के इस बयान से तो ईर्ष्या, नफरत, घृणा और विपक्ष की हताशा, निराशा और खीझ मिटानेवाली दूषित मानसिकता की बू आती है. खैर नौवीं फेल, गलत संस्कार में पले व्यक्ति की बुद्धि का विस्तार कहाँ तक हो सकता है?

जरा “बयानवीर” की तह में चलिए. 1997 की बात है. आपको याद होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के बारे में तेजस्वी के पिता और बड़बोले राजनेता श्री लालू यादव ने ठेठ भोजपुरी में क्या कहा था- “गुजरलवे पी.एम होई.” ये तब की बात है जब श्री गुजराल के नाम पर खींचा-तानी हो रही थी और बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव “किंगमेकर” की भूमिका में थे. गुजराल साहब शालीन व्यक्तित्व के धनी थे. उन्होंने इस पर सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा मगर अहंकार से भरे तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव तब सुर्खियाँ बटोर ले गए थे.
अब इन “बयानवीर” की मां और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी की बदजुबानी देखिये. ये एक निहायत ही घरेलु और लगभग “अनपढ़” महिला थीं जिन्हें परिस्थितिवश मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गयी थी. हाल ये था कि वे शपथ लेने में बार-बार अटकीं और किसी तरह यह औपचारिकता पूरी की गयी. वे अपना हस्ताक्षर भी नहीं कर पति थीं. खैर, कौन बोलता है. “सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का.” श्री सुन्दर सिंह भंडारी बिहार के राज्यपाल थे. वे एक पैर से थोडा लंगडाकर चलते थे. सादगीपूर्ण जीवन जीनेवाले श्री भंडारी पद की मर्यादा और व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करना जानते थे. किसी संवैधानिक मसले पर मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी उनसे मिलने गयीं. बाहर आकर वे गुस्से से तमतमाई हुई थीं. प्रेस ने उनसे कुछ पुचा तो वे बिफर गयीं और कह दिया – भंडार एक पैर से लंगड़ा है. दूसरा पैर भी मारकर तोड़ देंगे. हंगामा मच गया. राज्यपाल श्री भंडारी ने तो कोई सार्वजनिक बयां नहीं दिया लेकिन इससे सरकार की खूब फजीहत हुई. अब जिसे शर्म, लिहाज़, गरिमा, मर्यादा जैसे शब्दों के अर्थ मालूम हो, वो न इसे जाने. खैर, ये तो हुई “बयानवीर” की पारिवारिक पृष्ठभूमि. अब जरा इनकी काबिलियत देख लीजिये. गत 12 जुलाई को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी बिहार विधान सभा के शताब्दी समारोह का समापन करने पटना आये थे. नेता, प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को भी मंच पर बोलने की अनुमति थी. अपने चार मिनट के बेसिर-पैर के भाषण में वे छह बार अटके. क्या कमाल है? अगर चुनावी सभा होती, सरकार की आलोचना करनी होती, जातिगत आरक्षण पर ये बोलते तो तेजी देखने लायक होती. धाराप्रवाह, धुआंधार भाषण देते. प्रधानमंत्री के सामने क्यों सांप सूंघ गया था? इनका बचाव किया इनकी एक बहन ने- बोलीं , क्यों इस मामले को तिल का ताड़ बनाया जा रहा है? खैर, दूसरे दिन ये जनाब आँखों की जाँच कराने चले गए और इनके एक सिपहसलार श्याम रजक ने सफाई दी कि लिखा हुआ भाषण पढ़ने में इन्हें दिक्कत हो रही थी.
इससे हटकर जरा देखें तो सोचनेवाली बात ये है कि आखिर क्या परिस्थिति होती है जब कोई कुछ भी बोल देता है? ऐसा करके वह समाज को क्या सन्देश देना चाहता है? डिजिटल मीडिया का युग है. सब कुछ सुरक्षित रखा जा सकता है जिसे वर्षों बाद भी टीवी, मोबाइल या कंप्यूटर पर देखने पर आप शर्मिंदा भी हो सकते हैं. सार्वजनिक जीवन में शब्दों पर नियंत्रण और कम बोलना भी एक कला है जिससे कभी भी आपअपनी नज़रों में गिरेंगे नहीं. खुद की नज़रों में अपमानित क्यों होना? इससे लोकतंत्र भी स्वस्थ और समृद्ध होगा. है न सही बात.
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