श्यामनंदन कुमार
बचपन में एक लोकोक्ति हम सबने सुनी थी- झूठ बोलना पाप है, नदी किनारे सांप है, वही तुम्हारा बाप है. बच्चे खेल -खेल में किसी से सच उगलवाने के लिए इसका बेधड़क प्रयोग करते थे. वे नहीं जानते थे कि इसका क्या अर्थ है, इसके पीछे क्या सन्देश है, लेकिन इस लोकोक्ति से खेलते खूब थे. ये अलग बात है कि आज से 50 साल पहले का वक़्त कुछ और था. आज का दौर दूसरा है. सच्चाई, ईमानदारी और निर्मल मन आज दुर्लभ मानवीय गुण हो गए हैं जिनकी आज के घोर मतलबी और संकीर्ण समाज में कोई क़द्र नहीं रह गयी है. लेकिन, अपवाद भी होते हैं. एक फिल्म का गाना भी है जिसे मोहम्मद रफ़ी साहब ने अपनी आवाज़ दी है- “जान क्या चीज़ है ईमान भी दे सकता हूँ.” मतलब यह कि ईमान पक्का हो तो इन्सान भी पक्का होगा. उसका बाप दूसरा नहीं हैं, पैदाईश में फर्क नहीं है. जान तो छोटी चीज़ है. ये आनी-जानी है.

कहानी गुजरात की है. वहां एक जिला है- हलवद. वहां पिछले साल भयंकर बाढ़ आई थी जिसमें “रणछोड़” गाँव के एक किसान मुन्ना भाई ठाकोर का भी सब कुछ बह गया था. रात में अचानक बाढ़ आ गयी तो मुन्ना भाई परिवार और सामान की हिफाज़त में लगे थे. इस बीच उनका एक स्टील का डिब्बा जिसमें उन्होंने बचत के पैसे रखे थे, बाढ़ में बह गया. फसल भी ख़राब हो गयी थी. बेचारे ने हर तरफ वह डिब्बा खोजा मगर वह नहीं मिला. हर तरफ से निराश और मजबूर मुन्ना भाई अपना दुर्भाग्य मानकर नए सिरे से जिंदगी की गाड़ी खीचंने लगे.
बीते सोमवार को “रणछोड़” गाँव से कुछ किलोमीटर दूर एक अन्य गाँव सरभन्दा में मुकेश भाई दोराला नामक एक किसान अपने गाँव की सीमा पर पशु चरा रहा था. बाढ़ के पानी में बहता हुआ मुन्ना भाई का रुपयों वाला डिब्बा इसी गाँव मैं पहुँच गया था जहाँ मलबा साफ होने के बाद धूप में वह चमक रहा था. मुकेश भाई ने उत्सुकतावश वह डिब्बा हाथ में लेकर खोला तो उसमें 100-100 के नोट भरे थे. कुल 22 हज़ार रुपये थे. मुकेश भाई वह डिब्बा लेकर गाँव पहुंचे और सरपंच को सारी बात बताई. इसके बाद गाँव वालों ने आस-पास के गांवों से जानकारी ली तो पता चला कि “रणछोड़” गाँव के एक आदमी का पिछले साल आई बाढ़ में रुपयों से भरा डिब्बा बह गया था. सरपंच गाँव वालों के साथ वहां पहुंचे और पता कर वह रुपयों भरा डिब्बा मुन्ना भाई को लौटा दिया. मुन्ना भाई की तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा. बेचारे मुन्ना भाई ने अपने मकान की ढलाई के लिए मेहनत कर पैसों को जोड़ कर रखा था. खैर, पैसे मिलने के बाद मुन्ना भाई ने एक हज़ार रुपये मंदिर में दान किये. उन्होंने डिब्बा खोजने वाले मुकेश भाई को भी इनाम में कुछ पैसे देने चाहे, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया. कहा- ये पैसा मेरा तो था नहीं. जिसका था, ईश्वर की कृपा से वह पहुंचा दिया. इसमें इनाम वाली कोई बात नहीं है. ईमान बड़ी चीज़ है. मुकेश भाई ने झूठ नहीं बोला, पाप नहीं किया. उन्होंने उसी ईमान को जिन्दा रखा है और ऊपर लिखी बहुत पुरानी लोकोक्ति को वे आज भी जीते हैं. आज के समाज के लिए यह बड़ा सन्देश है. सच्चाई और ईमानदारी की हम क़द्र करना सीखें. बधाई मुकेश भाई.
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