सनातन एवं जैन धर्म में खास महत्व है अक्षय तृतीया का

सम्यक न्यूज़, पटना.

सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है. मान्यता है कि श्री विष्णु भगवान ने आज के ही दिन अपना छठा अवतार महर्षि परशुराम के रूप में लिया था. वहीँ जैन धर्म में भी इस पावन दिन का खास महत्व है क्योंकि इसी दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने एक वर्ष के उपवास के पश्चात पहली बार आहार लिया था.

जैन श्रद्धालुओं के अनुसार अक्षय तृतीया का प्राचीन इतिहास हस्तिनापुर तीर्थ से ही प्रारंभ हुआ है। वैशाख सुदी तीज को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। अक्षय का अर्थ है जिस वस्तु का कभी क्षय न हो अर्थात् वस्तु समाप्त न हो और वह महीना वैशाख का था और तिथि तृतीया थी। इसलिए इसका नाम अक्षय तृतीया पड़ा। इस दिवस को किया जाने वाला कार्य वृद्धि को प्राप्त होता है। भगवान ऋषभदेव को हुए करोड़ों साल व्यतीत हो गये। लेकिन आज भी अक्षय तृतीया का पर्व मनाने के लिए देश एवं विदेश से जैन श्रद्धालु हस्तिनापुर की धरती पर आते हैं और श्रद्धापूर्वक भजन करते हैं —

इच्क्षु रस का हुआ पारण, आखा तीज महान।

जय जय ऋषभदेव भगवान, जय जय ऋषभदेव भगवान।।

भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर दि. जैन समिति के मंत्री, विद्वत् महासंघ के महामंत्री तथा प्रतिष्ठाचार्य श्री विजय कुमार जैन  ने बताया कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को मुनि दीक्षा लेने के बाद एक वर्ष 39 दिन के उपवास के पश्चात्  हस्तिनापुर नगरी के राजा श्रेयांस ने आहार देकर दान की प्रथा को प्रारंभ किया। इससे पूर्व लोग ये नहीं जानते थे कि जैन साधु को आहार किस प्रकार दिया जाता है। महाप्रभु ऋषभदेव के नगर में आगमन के पश्चात राजा श्रेयांस एवं सोमप्रभ ने “हे भगवन् अत्रो-अत्रो, तिष्ठो-तिष्ठो आहार जल शुद्ध है, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि आहार-जल शुद्ध है मुद्रा छोडिये आहार ग्रहण करिये” (जैन मुनी को आहार देने की विधि) नवधा भक्ति पूर्वक पड़गाहन कर लेते हैं एवं अष्ट द्रव्य से पूजन कर नमस्कार करते हैं. ऐसे निवेदन कर प्रभु से आहार ग्रहण करने हेतु प्रार्थना करते हैं. भगवान ऋषभदेव करपात्र में आहार प्रारंभ कर देते हैं. बड़ी भक्ति के साथ राजा श्रेयांस इच्छुरस (गन्ने) का आहार देते हैं। प्रभु ऋभषदेव आहार करके वन की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। उस दिन सारे नगर में गन्ने के रस का प्रसाद वितरण किया जाता है। लेकिन फिर भी गन्ने का रस समाप्त नहीं होता है। वह अक्षय हो जाता है।

प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन

श्री जैन ने बताया कि मेरठ के पास स्थित हस्तिनापुर जम्बूद्वीप स्थल पर जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से आहार महल का निर्माण किया गया है, जिसमें भगवान ऋषभदेव व राजा श्रेयांस की प्रतिमा विराजमान की गई है। प्रत्येक वर्ष इस प्रतिमा के समक्ष इच्क्षुरस का आहार करवाया जाता है एवं आने वाले भक्त भगवान को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त करते है एवं गन्ने के रस का प्रसाद ग्रहण करते है। अक्षय तृतीया का पावन पर्व हस्तिनापुर से ही प्रारंभ हुआ है इसकी पहचान ही हस्तिनापुर से है। उसी मान्यता को लेकर भक्तगण आज भी इस धरती पर आ करके अक्षय तृतीया के दिन तीर्थ पर विराजमान साधुओं को आहार देकर के अपने जीवन को धन्य मानते है।

पूरे देश में एक साथ रक्तदान शिविर

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Author: undekhilive

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