राजनीतिक वनवास में ढकेल दिए गए RCP
श्यामनंदन कुमार, पटना.
अपने ज़माने की बहुचर्चित और सुपरहिट फिल्म “दीवार” का एक डायलॉग उस समय युवा दिलों पर राज करता था- “मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता”. ये डायलॉग फिल्म के हीरो और एंग्री यंगमैन, सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने डावर साहब को कहे थे. बिहार के यशस्वी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस डायलॉग के बड़े मुरीद है और इसे वे अपने अंदाज़ में कहते हैं- “मैं आज भी जो पुड़िया बांध देता हूँ, आसानी से नहीं खुलती है”. नीतीश कुमारने पुड़िया बंधने की कला अपने पिता कविराज वैद्य रामलखन प्रसाद से सीखी थी. वैद्य जी अपने मरीजों को पुड़िया में बांध कर दवा देते थे. धीरे – धीरे किशोर नीतीश कुमार ने पिता के कामों में हाथ बंटाना शुरू किया और पुड़िया बांधना सीख गए. आज राजनीति में एक लम्बा सफ़र तय करने में उनके पुड़िया बांधने के हुनर का बड़ा हाथ है. जो भी इनकी आँखों में खटका, या राह में दायें-बाएँ हुआ या पायजामे से बाहर हुआ- उसकी पुड़िया इन्होने ऐसी बांधी कि समझो खेल ख़त्म. “तेरा क्या होगा कालिया” की तर्ज़ पर. राजनीतिक विरोधियों को निपटाने में बड़े सख्त हैं सरकार.
2003 में जनता दल के बंटवारे और जनता दल (सेक्युलर) जनता दल (यूनाइटेड) बनने के बाद नीतीश कुमार ने इस पार्टी को अपने मन मुताबिक ही चलाया है, चाहे अध्यक्ष कोई हो. जैसे कभी कांग्रेस के नेता देवराज अर्स ने कहा था- INDIRA IS INDIA AND INDIA IS INDIRA. वैसे ही बिहार में नवम्बर 2005 से सत्तासीन नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) का मतलब ही है- नीतीश ही जद(यू) हैं और यह नीतीश से शुरू होकर नीतीश पर ही ख़त्म हो जाती है. तो क्या समाजवादी धारा और कांग्रेस धारा मिलकर एक हो गयी है?
थोडा पीछे चलते हैं. अतीत में झाँकने पर इस परिदृश्य को समझना आसान होगा. 1974 के छात्र आन्दोलन की उपज नीतीश कुमार समाजवादी धारा के निकट थे. 1977 और 1980 के दो विधानसभा चुनाव ये हार चुके थे. राजनीतिक पारी सिमटने लगी थी. फिर भी इनका संघर्ष जारी रहा. 1985 का विधानसभा चुनाव जीतकर ये पटना पहुंचे. इस बीच केंद्र में बोफोर्स तोप घोटाले के कारण राजीव गाँधी की सरकार वी.पी.सिंह के आन्दोलन के चलते बदनाम हो गयी थी. 1989 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार को बाढ़ संसदीय सीट से टिकट मिल गया और विधान सभा के कार्यकाल अधूरा छोड़कर ये दिल्ली कूच कर गए. इसके बाद इन्होने पीछे मुड़कर नहीं देखा. इन्हें वी.पी.सिंह और जॉर्ज फ़र्नान्डिस का भरपूर सहयोग मिला और ये केंद्र की राजनीति में रम गए. इधर 1990 में लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने और बिहार की राजनीति लालू केन्द्रित हो गयी. उधर केंद्र में रामविलास पासवान का अलग ही जलवा था. नीतीश कुमार ने इस राजनीतिक चक्रव्यूह में घुस कर अपनी जगह बनाई. तो क्या संघर्ष के बाद मिली सफलता ने इन्हें अहंकार के शिखर पर पहुंचा दिया है? लालू यादव से इनकी अनबन 1993 से ही शुरू हो गयी थी. शुरू- शुरू में नीतीश कुमार ने जाती के नाम पर राजनीती से काफी परहेज़ किया और खुद को कभी कुर्मी नेता के रूप में नहीं प्रोजेक्ट किया लेकिन, लालू यादव की जाती आधारित राजनीति की सफलता ने इन्हें भी आकर्षित किया. 1994 में पटना के गाँधी मैदान में आयोजित कुर्मी चेतना महारैली में इन्हें विधायक सतीश कुमार ने कुर्मी नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया. रैली की सफलता ने नीतीश कुमार के मन में गुदगुदी जगा दी. बस फिर क्या था, नीतीश कुमार के सपने अंगडाई लेने लगे. हालाँकि केंद्र में भी NDA की सरकार में ये लगातार मंत्री रहे लेकिन, मुख्यमंत्री की कुर्सी किसे नहीं लुभाती है? नियमित अंतराल पर विधायक सतीश कुमार को भी निपटा दिया गे. आज वे राजनीतिक बियावान में भटक रहे हैं.

इसके बाद बारी आती है सादगी, संघर्ष और जीवटता की प्रतिमूर्ति जॉर्ज फ़र्नान्डिस की. जॉर्ज साहब मुजफ्फरपुर सीट से लोकसभा का चुनाव जीतते थे. नीतीश कुमार इन्हें नालंदा ले आये और वे यहीं से जीत कर लोकसभा पहुंचे. 2003 में जॉर्ज साहब जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. जॉर्ज की करीबी जया जेटली को राज्यसभा भेजने के मुद्दे पर नीतीश कुमार से इनकी अनबन हो गयी. जॉर्ज फ़र्नान्डिस को जो फ़जीहत हुई कि मत पूछिए. इतना कद्दावर नेता समय के चक्र में ऐसा फंसा कि 2009 का लोकसभा टिकट भी कट गया. बेचारे ने निर्दलीय हिम्मत की तो पराजय का मुंह देखना पड़ा. जॉर्ज को निपटा दिया गया. हालाँकि बाद में उन्हें राज्यसभा भेजा गया. जिस सीढ़ी के सहारे नीतीश कुमार छत पर चढ़े, उसे ही लात मार दी. 2006 में जॉर्ज को हटाकर शरद यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया. शरद यादव बिहार की राजनीति में डोल-पत्ता थे. यानी कि बिन पतवार की नाव. 2014 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद नीतीश कुमार ने इन्हें भी रास्ता दिखा दिया और बाद में इन्हें भी राज्यसभा भेजा. 2016 में खुद नीतीश कुमार राष्ट्रीय अध्यक्ष बन बैठे. दिसम्बर 2020 में रामचंद्र प्रसाद सिंह (RCP) को पार्टी की कमान सौंप कर उन्हें पार्टी में नंबर दो की हैसियत दी. RCP नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद शख्स बं गए थे. बिहार के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं तक – सबको एक सूत्र में बांध लिया था RCP ने. इन्हें 2010 में पहली बार और 2016 में दूसरी बार राज्यसभा में भेजा गया. RCP केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल हो गए और इस्पात मंत्रालय मिला. लेकिन जब तीसरा मौका आया तो इनका पत्ता नीतीश कुमार ने काट दिया. नतीजा हुआ कि RCP को केंद्रीय मंत्रिमंडल भी छोड़ना पड़ा. जब सरकार में RCP की हैसियत बढ़ने लगी तो उनके दुश्मन और कानाफूसी करने वाले भी बढ़ने लगे. नतीजा ये हुआ कि RCP पर नीतीश कुमार का विश्वास डोल गया. वक्त ने इतनी तेज़ी से करवट ली कि नीतीश कुमार ने RCP को कहीं का नहीं छोड़ा. न घर के रहे न घाट के. एक बात दिलचस्प है कि तीनों राष्ट्रीय अध्यक्षों की दुर्गति राज्यसभा भेजकर ही की गयी
दरअसल अहंकार, ठकुरसुहाती एक ऐसी इंसानी प्रवृत्ति है जिस पर समय की चाल का असर नहीं होता है. उसे वही अच्छा लगता है जो उसकी सोच को सही साबित करने का दिखावा करता है. संभवतः नीतीश कुमार भी इसी प्रवृत्ति के शिकार हैं. उनको लगता होगा कि मेरा प्यादा अपने वजीर को कैसे मार सकता है. स्वार्थों का टकराव भी एक बड़ी वज़ह हो सकती है. नीतीश कुमार को अपने से बड़ा उनके प्यादे का कद कैसे सुहा सकता है? आज राजनीति में अनुकम्पा और चापलूसी पर बड़ा मुकाम पाए लोग भी RCP को आईना दिखाने की होड़ में हैं. देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा IAS छोड़कर राजनीतिक पारी खेलने आये RCP ज़रूर मगर वे RUN OUT हो गए हैं.
नेत्र रोगियों के लिए वरदान है राधा देवी मोहनका चैरिटेबल ट्रस्ट— महापौर





