अन्नदाता सुखी भवः, बीत गए पांच साल, झोली खाली
श्यामनंदन कुमार
जरा सोचिये, कैसा लगा होगा. पाटलिपुत्र के बीजेपी सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव ने कल मनेर में खरीफ अभियान का शुभारम्भ और किसानों का गुणगान किया. कहा– किसान धरती के भगवान हैं, अगर ये अन्न उपजाना छोड़ दें तो हम सब भूखे मर जायेंगे. इन्हीं किसानों की बदौलत केंद्र सरकार ने कोरोना काल में गरीबों को पांच किलो राशन मुफ्त मुहैय्या कराया. इतना गुणगान करके वे अभी मंच पर सुस्ता ही रहे थे कि स्थानीय राजद विधायक भाई वीरेन्द्र ने उनके भाषण की धज्जियां उड़ा दीं. कहा- केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा किसानों के हित का कार्यक्रम मात्र ढकोसला है. भाई वीरेन्द्र बिहार में विपक्ष में हैं. सो, उन्होंने एक साथ ही दोनों सरकारों को निशाने पर ले लिया. क्या उन्होंने कुछ गलत कहा? क्या किसानों को अन्नदाता, धरती का भगवान कह देने से उनकी आर्थिक स्थिति सुधर रही है? क्या खेती-किसानी में लगी आबादी इस कार्य से खुश है और हर साल नए जोश के साथ उपज बढ़ाने में जुट रही है? अगर किसानों को आजीविका का विकल्प मिलेगा तो क्या वे खेती नहीं छोड़ देंगे? क्या उच्च शिक्षा प्राप्त नयी पीढ़ी खेती-किसानी को अपना करियर बना रही है? उत्तर है- नहीं. क्यों नहीं! इसका जवाब आगे मिलेगा.
साल 2017 . दिल्ली का लाल किला. दिन 15 अगस्त. शानदार साफा बांधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी तिरंगा फहराने के बाद पूरी रौ में भाषण दे रहे थे. देश मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था. देश का अन्नदाता किसान उनके दिल में बसे थे. श्री मोदी ने ऐलान किया- आज़ादी का अमृत महोत्सव यानी 75वां वर्ष 2022 में मनाया जायेगा. मैं देश के किसानों को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि मेरी सरकार अगले पांच वर्षों के दौरान उनकी आमदनी दोगुनी करने की दिशा में कार्य करेगी. जोरदार तालियाँ बजीं. “धरती के भगवान” निहाल हो गए. देश के प्रधानमंत्री लाल किले से बोल रहे हैं, ज़रूर उनके मन में ये भावना रही होगी कि किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर करना है.
साल 2022 आ गया. इस बीच 2019 का लोकसभा चुनाव जीतकर श्री मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने. अनेक क्षेत्रों में विकास के नए आयाम स्थापित हुए. हर साल फसलों के समर्थन मूल्य भी घोषित हुए. इस साल भी हुए. धान सहित 17 खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य की घोषणा कर केंद्र सरकार ने अपनी पीठ थपथपा ली. कहा- किसानों को उनकी उपज की लागत की डेढ़ गुनी कीमत दिलाने के लिए सरकारप्रतिबद्ध है. मगर ये तो ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं है. अगर आप सरकार की कलाबाज़ी देखेंगे तो खेती से मुंह मोड़ते किसानों की असलियत समझ में आ जाएगी. मुख्य खाद्यान्न फसल धान के समर्थन मूल्य में मात्र 100 रूपए और मक्का के समर्थन मूल्य में 92 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोत्तरी की गयी है. इसी तरह अन्य फसलों के समर्थन मूल्य में भी सांकेतिक बढ़ोत्तरी की गयी है. आदरणीय मोदीजी, जरा दिल पर हाथ रखकर कहिये कि क्या पिछले पांच साल में किसानों की आमदनी दोगुनी हो गयी है? क्या अन्नदाता सुखी हो रहा है? क्या उसकी झोली भर रही है? क्या आप किसानों के नाम पर कुछ अलग नहीं खेल रहे हैं जिससे राजनीतिक फायदा मिलता रहे? अन्नदाता खुशहाल रहे, सुखी रहे, देश का खाद्यान्न भंडार भरा रहे- ये हर देशवासी की कामना है, मगर सिर्फ नारों से और खेती के नए विकल्प समझाने से अन्नदाता कैसे सुखी होगा सरकार? सोचियेगा जरूर. शेष अगली क़िस्त में………….
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