सम्यक न्यूज़, पटना.
पांच साल पहले पति को खोया. खुद के साथ चार बच्चों की परवरिश का कोई जरिया नहीं. वक़्त के सितम से टूट चुकी लूसी अपने चार बच्चों के साथ दाने-दाने को मोहताज़ हो गयी थी, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. कुछ कर गुजरने को ठान लिया और जब वह रूढ़ियों को तोड़कर आगे बढ़ी तो वक़्त ने सलाम किया. हाथों के हुनर को जब स्वाभिमान का सहारा मिला तो लूसी के जीवन में पतझड़ की जगह वासंती बयार आ गयी. यह कोई कहानी नहीं है बल्कि संघर्ष से पाई हुई मंजिल की दास्ताँ-ए-जुबानी है.
आम तौर पर बढ़ई का काम हमेशा से पुरुष प्रधान रहा है, लेकिन अनिसाबाद की रहने वाली लूसी ने स्वाभिमान से समझौता किए बिना हाथों में आरी उठा ली। सिर्फ काम ही नहीं सीखा बल्कि दक्षता भी हासिल की। अब वे न सिर्फ घंटों में फर्नीचर बनाती हैं बल्कि चारों बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने के साथ परिवार वालों को रोजगार भी दे रही हैं। 2017 में पति को खोने के बाद लूसी का घर को चलाने वाला कोई नहीं था। घर में खाने तक के पैसे न थे। वहीं लूसी को निहारते हुए चार मासूम बच्चे भी थे। इसके बाद लूसी अपने चारों बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए दिन रात मेहनत करने लगी। समाज की बंदिशों की परवाह किए बिना बढ़ई का काम शुरू कर दिया।
लूसी बताती है , ‘पति के गुजर जाने के बाद दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी काफी मुश्किल था। चार बच्चों के भोजन-पानी की चिंता थी। इसलिए, समाज की बंदिशों को तोड़कर अपने पैर पर खड़ा होने का फैसला किया। फर्नीचर का काम सीखने के लिए मैंने किसी तरह की ट्रेनिंग नहीं ली। बस मुझे लगा कि मैं यह कर सकती हूं तो मैंने इस काम को करना शुरू कर दिया। आज इस काम के जरिए अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पा रही हूं और साथ ही यह बिजनेस भी काफी अच्छा चल रहा है। आज मैं पलंग, सोफा, डाइनिंग टेबल, आदि फर्निचर की सारी चीजे करती हूं।’ इस काम से लूसी महीने में 40 हजार तक बचा लेती हैं। इससे वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहीं हैं। इतना ही नहीं लूसी ने खुद के साथ अपने परिवार के लोगों (देवर, जीजा और अन्य) को रोजगार भी दिया है। उनके काम करने के अंदाज को देख कोई भी उनका दीवाना हो जाएगा। लकड़ियों से एक से बढ़कर एक डिजाइन की फर्नीचर चंद घंटों में तैयार कर देती हैं। जब वो लकड़ियों पर कारीगरी करती है तो इतने लगन से अपने काम में डूब जाती है कि उन्हें अपने आसपास कुछ नहीं दिखता। आज लूसी न सिर्फ आत्म निर्भर हैं बल्कि समाज के सामने रास्ता दिखानेवाली मज़बूत शख्सियत के रूप में बुलंद आवाज़ हैं.
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