श्यामनंदन कुमार
आपने “शूल” फिल्म देखी होगी. प्रकाश झा की ये फिल्म भ्रष्ट व्यवस्था से लड़नेवाले एक ईमानदार पुलिस सब-इंस्पेक्टर की कहानी है जिसे अपने अभिनय से जीवंत किया था मनोज वाजपेयी ने. स्थानीय विधायक की गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार से आजिज़ आकर और महकमे के आला अधिकारियों का समर्थन नहीं मिलने से आहत सब-इंस्पेक्टर अंततः विधायक की गोली मारकर हत्या कर देता है. वो भी विधान सभा का सत्र चलने के दौरान भवन में घुसकर. गोली मारने से पहले सब-इंस्पेक्टर विधायक की कनपटी पर सर्रिविस वाल्वर सटाकर याद दिलाता है कि तुम्हारे कारण वर्षों से मेरे दिल में जो “शूल” चुभा हुआ था, आज में उसे निकाल ही देना चाहता हूँ और फायर कर देता है. सब-इंस्पेक्टर को जो करना था, उसने कर दिया लेकिन अपने मुख्यमंत्री माननीय नीतीश कुमार क्या करें? करीब पंद्रह वर्षों से एक “कांटा” इनके दिल में भी चुभा हुआ है और उसकी टीस रह-रहकर जुबां पर आ जाती है. ये कोई मामूली “कांटा” नहीं है. इसकी कीमत 970 करोड़ रुपये है. जी हाँ, सही पढ़ा आपने. गत 7 जून को एक बार फिर वही टीस उनको घायल कर गयी जब वे केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के साथ महात्मा गांधी सेतु के पूर्वी लेन का शुभारंभ करने आये थे. अपने भाषण में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उसी 970 करोड़ रुपये का जिक्र कर ही दिया. ये बात अलग है कि आज बिहार का बजट ही लगभग 2.50 लाख करोड़ रुपये का है और सड़क, पुल , मेगाब्रिज, फोर लेन, सिक्स लेन राजमार्गों के निर्माण पर अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं जिसमें राज्य और केंद्र की डबल इंजन की सरकार पूरी गति से काम कर रही है. फिर 970 करोड़ रुपये का जिक्र क्यों?

थोड़ा पीछे चलते हैं. बात नवम्बर 2005 की है. 1990 से 2005 के लालू -राबड़ी सरकार के कार्यकाल में बिहार खस्ताहाल हो गया था. सड़क, बिजली, स्कूल, अस्पताल -सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए थे. मरम्मत के पैसों की लूट-खसोट से सड़कों (राजकीय एवं राष्ट्रीय राजमार्गों सहित) पर बड़े-बड़े गड्ढे थे. यह कहना मुश्किल था कि गड्ढे में सड़क है या सड़क पर गड्ढे हैं. सड़कों पर चलना मतलब जान जोखिम में डालना था. किसी तरह समय कट रहा था. त्राहिमाम की स्थिति थी. उस पर राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव का यह कहना कि चिकनी सड़क पर एक्सीडेंट बहुत होता है और उसमें गरीबों की जान चली जाती है, इसलिए सड़क में गड्ढा है तो ठीक है. यह “जले पर नमक छिड़कने “ जैसा था. हालाँकि दूसरी तरफ वे पटना के बेली रोड को प्रसिद्ध अभिनेत्री “हेमा मालिनी” के गाल की तरह चिकनी बनाने का दावा करते थे. जनता ने इस कुशासन से ऊबकर नवम्बर 2005 के विधान सभा चुनाव में एनडीए को वोट दिया और “विकास पुरुष” की छवि वाले नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी. लोगों में नयी आशा का संचार हुआ. सबसे पहले इस सरकार ने अपने संसाधनों से सड़कों के गड्ढे भरे और उसे चलने लायक बनाया. लोगों को बड़ी रहत मिली और सरकार के प्रति विश्वास जगा. उस समय सिर्फ सड़कों की मरम्मत पर 970 करोड़ रुपये का खर्च आया था. राज्य सरकार के लिए उस समय यह बड़ी रकम थी जो जनहित में खर्च की गयी थी. मुख्यमंत्री माननीय नीतीश कुमार ने तब की केंद्र सरकार जिसके मुखिया मनमोहन सिंह थे, से उस राशि के भुगतान का आग्रह किया. केंद्र सरकार ने न तो आग्रह अस्वीकार किया और न ही राशि का भुगतान किया.

वक़्त गुजरता रहा. 2009 का संसदीय चुनाव आया. अपने भाषणों में नीतीश कुमार इस राशि का जिक्र करना नहीं भूलते थे. केंद्र में फिर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए. पैसा फिर भी नहीं मिला. 2010 के विधान सभा चुनाव आ गया. अपने पहले कार्यकाल के आधार पर नीतीश कुमार ने जनता से वोट माँगा और पुनः मुख्यमंत्री बने. इस राशि का जिक्र उन्होंने फिर किया. नतीज़ा वही ढाक के तीन पात. फिर भी उन्होंने आस नहीं छोड़ी. 2014 के संसदीय चुनाव में केंद्र की सरकार बदल गयी. नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने. राज्य सरकार की ओर से पुरानी मांग दुहराई गयी. आश्वासन मिला, पैसा नहीं मिला. नीतीश कुमार सब्र किये रहे. 2015 का विधान सभा चुनाव आ गया. सरकार तो बदल गयी, मगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बने. बेचारे अर्जी लगाते रहे, मगर केंद्र की सरकार उस पर कुंडली मरकर बैठी रही. 2019 के संसदीय चुनावों और 2020 के बिहार विधान सभा के चुनाव में एक बार पुनः क्रमशः नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने. जनता के विश्वास पर दोनों नेता बार-बार खरे उतरते रहे हैं मगर, पैसा नहीं मिला. पहले दस साल कांग्रेस की सरकार से गुहार लगाई, अब आठ साल से एनडीए की सरकार से उम्मीद बांधे हुए हैं. 2022 में जब 7 जून को महात्मा गांधी सेतु के पूर्वी लेन का उद्घाटन करने का मौका आया तो वही दर्द फिर छलक गया. उस दिन सिर्फ इस सेतु का ही उद्घाटन नहीं हुआ बल्कि इसके साथ ही दोनों नेताओं ने करीब 13,585 करोड़ की लागत वाली 15 परियोजनाओं का भी उद्घाटन एवं शिलान्यास किया.
सवाल राशि का नहीं है, बल्कि अनुरोध, आग्रह और समय पर जनता की भलाई में किये गए कार्यों के मूल्याङ्कन के समर्थन का है. रकम बड़ी नहीं है, 2005 का संकल्प बड़ा था, प्रयास बड़ा था. राशि का भुगतान नहीं करने के पीछे केंद्र सरकार का जो भी तर्क हो, उसे उदारता दिखाते हुए नियमों में संशोधन कर राशि का भुगतान कर देना चाहिए. 2005 में बिहार की जनता आपदा में ही जी रही थी. उस राशि को आपदा राहत में ही खर्च मानकर केंद्र को भुगतान कर देना चाहिए. सवाल सिर्फ सरकारों के बीच पत्राचार का ही नहीं है, व्यक्तिगत सम्बन्ध भी मायने रखते हैं. शायद नीतीश कुमार को उन संबंधों की अवहेलना भी टीस दे रही होगी.
सेवा, परोपकार एवं राष्ट्रभक्ति का संगम है माहेश्वरी समाज





