कैकेयी और मंथरा के कोप के बिना ही “रामचन्द्रजी” को वनवास मिला
श्यामनंदन कुमार, पटना.
कभी बिहार में नेता, प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की जुबां पर अक्सर एक जुमला हुआ करता था- RCP Tax. इसका वे मतलब भी समझाते थे. कहते थे- रामचंद्र प्रसाद सिन्हा टैक्स. दरअसल वे बिहार की प्रशासनिक मशीनरी (IAS, IPS) के ट्रान्सफर, पोस्टिंग में जद(यू) के कभी कद्दावर नेता रहे रामचंद्र प्रसाद सिन्हा की दखलंदाज़ी से चिढकर सरकार पर निशाना साधने के लिए इस जुमले का प्रयोग करते थे. आज समय बदल चुका है. भारत सरकार में इस्पात मंत्री रहे आर.सी.पी सिन्हा ने कल यानी 6 जुलाई को मंत्रिमंडल से इस्तीफा डे दिया. कल ही उनका जन्मदिन भी था. वे 64 वर्ष के हो गए. उनका राज्य सभा का दूसरा कार्यकाल आज समाप्त हो रहा है. हालाँकि कानूनी प्रावधानों के अनुसार वे अगले छह महीने तक मंत्री रह सकते थे, लेकिन उन्होंने किसी प्रकार के लालच, संकोच या दुविधा को निर्मूल करते हुए फैसला ले लिया. अब वे “भूतपूर्व” हैं. इधर नेता, प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी अपने पिता लालू प्रसाद यादव की गंभीर रुग्नावस्था के कारण एम्स, दिल्ली में सेवारत हैं. आज दोनों किरदारों की अनुपस्थिति में ये जुमला भी अप्रासंगिक हो गया है. त्रेतायुग में युवराज रामचंद्र को दासी मंथरा की चुगलखोरी से कुपित महारानी कैकेयी के श्राप के कारण 14 वर्षों के लिए वनवास जाना पड़ा था. इस कलियुग में “रामचन्द्रजी” को राजनीतिक वनवास तो मिला, मगर महारानी कैकेयी और मंथरा के कोप के बिना ही.
अब थोडा पीछे चलिए. RCP उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी थे. ये बिहार के मुख्यमंत्री के जिला से हैं. (गाँव- मुस्ताफापुर, प्रखंड- अस्थावां) नीतीश कुमार के स्वजातीय भी हैं. नीतीश कुमार पर स्व. अटलबिहारी वाजपेयी की भरपूर कृपादृष्टि रही. केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री से शुरू हुआ उनका सफ़र रेल मंत्री पर पूरा हुआ. इस बीच नीतीश कुमार की नज़र RCP पर पड़ी और उन्हें अपना आप्त सचिव बना लिया. जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो RCP का कैडर ट्रान्सफर करा कर बिहार ले आये और अपना प्रधान सचिव बना लिया. सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. RCP नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद शख्स थे. बिहार के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं तक – सबको एक सूत्र में बांध लिया था RCP ने. एक तरह से नीतीश कुमार ने पार्टी में इन्हें नंबर दो की हैसियत दी थी. सरकार में भी उनके अनुभव का लाभ मिल रहा था. इसीलिए तेजस्वी यादव बार-बार वह जुमला उछालते थे, लेकिन इससे नीतीश कुमार को कोई फर्क नहीं पड़ा. 2010 में पहली बार और 2016 में दूसरी बार राज्यसभा में भेज दिया. RCP केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल हो गए और इस्पात मंत्रालय मिला. लेकिन जब तीसरा मौका आया तो इनका पत्ता नीतीश कुमार ने काट दिया. नतीजा हुआ कि RCP को केंद्रीय मंत्रिमंडल भी छोड़ना पड़ा. जब सरकार में RCP की हैसियत बढ़ने लगी तो उनके दुश्मन और कानाफूसी करने वाले भी बढ़ने लगे. नतीजा ये हुआ कि RCP पर नीतीश कुमार का विश्वास डोल गया. वक्त ने इतनी तेज़ी से करवट ली कि नीतीश कुमार ने RCP को कहीं का नहीं छोड़ा. न घर के रहे न घाट के.
अब RCP क्या करेंगे, राजनीति में क्या गुल खिलाएंगे- वे जानें मगर इतना तो बिलकुल साफ है कि निकट भविष्य में भाजपा इनपर दांव नहीं लगा सकती है. जिस तरह महाराष्ट्र में भाजपा ने खेला किया और “राजनीतिक विभीषण” की मदद से सत्ता हथिया ली, उसी तरह का ऑपरेशन बिहार में करना भाजपा के लिए काफी मुश्किल है. ये तो वही बात होगी कि हवन करते हाथ जला बैठे. भले जद(यू) बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी हो, लेकिन यहाँ सरकार का चेहरा तो नीतीश कुमार ही हैं और फ़िलहाल यहाँ सत्तासुख भोग रही भाजपा इसे गवांना नहीं चाहेगी.
दरअसल अहंकार, ठकुरसुहाती एक ऐसी इंसानी प्रवृत्ति है जो समय की चाल से बेफिक्र होता है. उसे वही अच्छा लगता है जो उसकी सोच को सही साबित करने का दिखावा करता है. नीतीश कुमार भी इस प्रवृत्ति के शिकार हैं. उनको लगता होगा कि मेरा प्यादा अपने वजीर को कैसे मार सकता है. स्वार्थों का टकराव भी एक बड़ी वज़ह हो सकती है. नीतीश कुमार को लगता होगा कि उनसे बड़ा उनके प्यादे का कद कैसे बड़ा हो सकता है? जहाँ तक भाजपा में RCP के पुनर्वास का प्रश्न है तो यह अभी दूर की कौड़ी है. “बिहार, बंगाल और ओडिसा” जो कभी एक प्रान्त था, वर्तमान में भी सत्ता के दृष्टिकोण से भाजपा के लिए काफी “टफ” है.
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