साध्वी डा. पियूष प्रभा जी लगातार पैदल विहार करते हुए समाज में सद्भाव, नैतिकता और नशामुक्ति का संदेश दे रही हैं। वे कानपुर जाने के क्रम में पटना में रुकीं। वे आचार्यश्री महाश्रमण जी तथा भगवान महावीर का संदेश जन-जन तक पहुंचा रही हैं।
कुमार अनिल
आचार्यश्री महाश्रमण जी की प्रेरणा से साध्वी डा. पियूष प्रभा जी पिछले 30 वर्षों से देशभर में विहार (पदयात्रा) कर रही हैं। वे सद्भावना का संदेश देती रही हैं कि आपस में सभी समुदाय सद्भाव के साथ रहें। वे पिछले दिनों फारबिसगंज में थीं। वहां उन्होंने चातुर्मास किया। इसके बाद पैदल विहार करते हुए पटना पहुंची हैं। यहां से वे पैदल ही कानपुर के लिए निकलेंगी।
साध्वी डा. पियूष प्रभा जी के साथ तीन अन्य साध्वियां भी पैदल विहार कर रही हैं। साध्वी भावनाश्री जी, साध्वी सुधा कुमारी जी, साध्वी दीप्ति यशा जी। इस साध्वी समूह की प्रमुख हैं डा. पियूष प्रभा जी। साध्वी समूह अमूमन एक दिन में 10 किमी की यात्रा करता है। इसके बाद फिर रुक कर स्थानीय लोगों से संवाद करते हैं। आचार्यश्री महाश्रमण जी का संदेश देती हैं। बताती हैं कि इस विहार के दौरान वे तीन बातों पर जोर दे रही हैं-सद्भावना बनी रहे, बाजार सहित जीवन हर क्षेत्र में नैतिकता तथा नशामुक्ति।
आचार्यश्री महाश्रमण जी अबतक 51 हजार किमी पैदल विहार कर चुके हैं। डा. पियूष प्रभा जी भी राजस्थान से बंगाल और दिल्ली से केरल तक पैदल विहार कर चुकी हैं। बताती हैं कि पैदल चलते समय उनके अपने उपयोग की चीजें जैसे उनका भिक्षा पात्र, कुछ कपड़े, पुस्तकें वे खुद अपनी पीठ पर लेकर चलती हैं।
डा. पियूष प्रभा जी ने 30 वर्ष की उम्र में दीक्षा ली। दीक्षा से पहले चार साल तक पारमार्थिक शिक्षण संस्थान में साधु जीवन जीते हुए अध्ययन में बिताया। मालूम हो कि किसी को भी अचानक दीक्षा नहीं दी जाती, बल्कि इच्छुक व्यक्ति को पारमार्थिक शिक्षण संस्थान में रह कर वर्षों अध्ययन और नियमों का पालन करना पड़ता है। डा. पियूष प्रभा जी ने छह साल तक दक्षिण भारत में विहार किया और भगवान महावीर के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया।
आज विभिन्न धर्मों के बीच नफरत का माहौल बढ़ रहा है, यह कैसे दूर होगा पूछने पर साध्वी डा. पियूष प्रभा कहती हैं कि इसके लिए सद्भावना पर जोर देना होगा। आपस में सद्भाव बना रहे, इसके लिए वे विहार कर रही हैं। कहती हैं कि नशामुक्ति युवाओं के लिए बहुत जरूरी है। साध्वी डा. पियूष युवाओं से कहती हैं कि वे प्रेक्षा ध्यान करें। यह ध्यान की ऐसी विधि है, जो उनके आवेश और आवेग को नियंत्रित करेगा तथा उनके जीवन में सफलता, शांति और खुशी का माध्यम बनेगा। प्रेक्षा ध्यान करने के साथ ही वे जीवन विज्ञान पुस्तक पढ़ें। जीवन विज्ञान दरअसल जीने की कला है, जिस पर आचार्यश्री महाश्रमण जी लगातार जोर दे रहे हैं।

साध्वी दीप्ति यशा जी अपना अनुभव बताती है कि नशामुक्ति पर बात शुरू होती है, तो शुरू में काफी संख्या में युवा जुटते हैं, पर धीरे-धीरे भीड़ छंटने लगती है। लेकिन उनका प्रयास जारी है, क्योंकि नशामुक्ति के बगैर युवाओं का भविष्य सुंदर नहीं हो सकता। साध्वी दीप्ति कहती हैं कि वे अपने कपड़े खुद सिलती हैं। अपने भिक्षा पात्र खुद बनाती हैं। वे भिक्षापात्र दिखाती हैं। वह इतना सुंदर और चमकीला है मानो किसी धातु पर पेंटिंग की गई हो। लेकिन भिक्षापात्र धातु का नहीं है, यह नारियल का है। साध्वी कहती हैं कि वे दर्जी भी हैं, धोबी भी हैं और मोची भी। सबकुछ स्वयं करती हैं। समूह की सभी साध्वियां इतनी सरल, सकारात्मक और करुणा-प्रेम से भरी हैं कि उनसे मिलकर आप देर तक खुद को तरोताजा महसूस करते हैं। इसीलिए कहा गया है कि सच्चे साधु के सान्निध्य में रहें।
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