जैन समाजसेवी और लेखक तनसुख बैद की नई पुस्तक का नाम है- भाव निर्झर। हमारे मन में जो भाव बसते हैं, उसी से बनता है हमारा व्यक्तित्व।
आज सोशल मीडिया में नकारात्मक विचारों की बाढ़ आई हुई है। एक बड़ी जमात परनिंदा में मशगूल है। हमारी युवा पीढ़ी इसमें फंसती जा रही है। कई को अपने नकारात्मक विचारों के कारण ही जेल जाना पड़ा। आप गौर करिए, जब कभी आप किसी के बारे में नकारात्मक विचार करने लगते हैं, तो सांसों की लय बदल जाती है। हमारे विचार ही, हमारे भाव ही हमारा व्यक्तित्व बनाते हैं।
इस लिहाज से तनसुख बैद की पुस्तक-भाव निर्झर-आज के समय के लिए बेहद उपयोगी है। हमारे मन में भाव हमेशा आते-जाते रहते हैं। तेरापंथी साधु-साध्वियों ने भावना के बारे में बहुत कुछ लिखा है।
तनसुख बैद बताते हैं कि भावनाएं दो प्रकार की होती हैं। शुभ और अशुभ भावना। अशुभ को त्याग कर शुभ भावना करनी चाहिए। यह बोलना आसान है, पर इसे जीवन में उतारना कठिन है। तनसुख बैद फिर 12 भावनाओं की चर्चा करते हैं। सभी भावों का विस्तार के साथ विश्लेषण करते हैं। ये 12 भावनाएं हैं- अनित्य भावना, अशरण भावना, संसार भावना, एकत्व भावना, अन्यत्व भावना, अशुचि भावना, आश्रव भावना, संवर भावना, निर्जरा भावना, लोक भावना, बोधि भावना, धर्म भावना।

प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ के सुपुत्र चक्रवर्ती भरत ने भावनाओं के आधार पर ही निर्मल होते गए और फिर केवल ज्ञान व केवल दर्शन प्राप्त किया। इसलिए भाव का बहुत महत्व है। यह संसारिक लोगों के जीवन में सुख-शांति और सफलता का माध्यम है। इस दृष्टि से यह पुस्तक आम लोगों, विद्यार्थियों सबके लिए पठनीय है।
तनसुख बैद अबतक 14 पुस्तकें लिख चुके हैं। इनमें आचार्यांजलि, जीना सीखें, तपांजलि, भक्तामर काव्य धारा, अणुव्रत गीत, मेरा बचपन ला दे मां, महाश्रमण अष्टकम , वीरांजलि(महावीर भजन माला), चंदनबाला(कथानक गीत माला), होली गीत, बुढ़ापा अभिशाप नहीं, वरदान है प्रमुख हैं।

शक्तिधाम में श्याम फाल्गुन महोत्सव 12 मार्च से





