भगवान महावीर का सन्देश – “क्षमा द्वारा क्रोध को शांत करें”

क्षमावाणी पर्व के साथ दस दिवसीय पर्युषण पर्व संपन्न

अनदेखी लाइव, पटना.

पटना के सभी दिगम्बर जैन मंदिरों में पिछले 10  दिनों से चल रहे महापर्व पर्युषण की समाप्ति आज क्षमावाणी पर्व के साथ संपन्न हुई. श्रद्धालु एम पी जैन ने बताया कि भगवान महावीर का सन्देश है – “क्षमा द्वारा क्रोध को शांत करें”: जैन संस्कृति में संवत्सरी क्षमापर्व प्राणीमात्र के प्रति प्रेम और मैत्री की भावना से ओतप्रोत अभिनव पर्व है। यह पर्व क्षमा के आदान-प्रदान का पर्व है। जैन धर्म न्याय व नीति का धर्म है। धर्म साधना की प्रक्रिया में क्षमा का महत्व स्थापन भगवान महावीर की एक महान देन है। उन्होंने सूत्र दिया – “सब जीव मुझे क्षमा करें, मैं सबको क्षमा करता हूँ, मेरी सर्व जीवों से मैत्री है, किसी से बैर नहीं।“ यह सूत्र ध्वनित करता है कि क्षमा स्वयं अपने में ही साध्य नहीं है। उसका साध्य है मैत्री और मैत्री का साध्य है समता और निर्वाण। क्षमा और मैत्री मात्र सामाजिक गुण नहीं हैं, वे साधना की ही एक प्रक्रिया को रूपायित करते हैं, जिसका प्रारंभ ग्रन्थि विमोचन होता है तथा अन्त में मुक्ति। क्रोध चार कषायों में एक है। वह वैराणुबद्ध करता है। क्रोध के पीछे मान खड़ा है, लोभ खड़ा है, माया भी खड़ी है, चारों परस्पर सम्बद्ध हैं।

श्री जैन ने बताया कि गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माता जी ने कहा है कि “क्षमा वीरस्य भूषणम्। क्षमा वीरों का आभूषण है, कायर व्यक्ति क्षमा नहीं कर सकता है।“ क्षमा निजात्मा का गुण है। क्रोधभाव अग्नि कण है। इसे बुझाने के लिए क्षमारूपी जल का होना आवश्यक है। आग से आग कभी नहीं बुझ सकती है। परस्पर में एक-दूसरे के प्रति मैत्री का भाव एवं प्रेम, वात्सल्य का होना बहुत जरूरी है क्योंकि यह प्रगति का मार्ग है। ऐसा जरूरी नहीं है कि जब कोई गलती हो तभी माफी मांगी जाये। आपस में वर्ष भर में एक बार इस पर्व के माध्यम से व्यक्ति एक-दूसरे के करीब आकर, गले लगा करके क्षमा मांगता है। पूज्य माताजी ने बताया कि क्षमा तीन प्रकार की होती है. पहली आध्यात्मिक, दूसरी आगम की क्षमा और तीसरी लोक व्यवहारिक क्षमा होती हैं। क्षमा का परमशत्रु क्रोध है, जिस पर विजय मनुष्य स्वयं से ही पा सकता है। क्षमा, मृदुता बाजार में कहीं नहीं मिलती. यह हमारे अन्दर ही रहती है। प्रतिकूल परिस्थितियां निर्मित हो जाने पर भी रोष में न आना, क्रोध की जागृति न होना आध्यात्मिक क्षमा है। प्रतिकार की शक्ति होने के बाद भी बदले के कार्य न करना, किसी का बुरा न चाहना आगम की क्षमा है, और लोक व्यवहारिक क्षमा का शत्रु क्रोध है. आगम में कहा गया है कि पूजा पाठ, स्त्रोत, तप और ध्यान से बढ़कर क्षमा है।

 इस अवसर पर प्रतिष्ठाचार्य डॉ पं. अभिषेक जैन (शिक्षाशास्त्री) का कहना है की क्रोध क्षमा को प्रगट नहीं होने देता। क्रोध के समान कोई पाप नहीं है, कोई शत्रु नहीं है और यह क्रोध ही विनाश की जड़ है। उन्होंने व्यक्ति के दायरे पर कहा कि व्यक्ति चाहता है कि सब उसकी सुनें, मानें, लेकिन प्रतिकूलता मिलने पर क्रोध आ जाता है। मनचाही वस्तु न मिलने पर, मनचाहा काम न होने पर व्यक्ति को क्रोध आ ही जाता है। जो पल-पल में क्रोध करते हैं, वो पग-पग पर अपने शत्रु तैयार कर लेते हैं। इस वजह से हर व्यक्ति को हमेशा क्रोध से बच कर रहना चाहिए। प्रातःकाल मीठापुर जैन मंदिर में 10 दिन उपवास करने वाली पांच महिलाओं को सम्मानित भी किया गया. संध्या में कदमकुआं जैन मंदिर में 108 कलश से भगवान का अभिषेक किया गया. पूजा के बाद मंदिर परिसर में इकट्ठे सैकड़ों जैन श्रद्धालुओं ने पूरे साल में अपने द्वारा जाने या अनजाने में की गयी गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा प्रार्थना की तथा सभी ने एक दूसरे को क्षमा किया।

क्षमावाणी महापर्व के साथ दशलक्षण पर्व सम्पन्न

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Author: undekhilive

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