लोभ पर विजय प्राप्त करना ही शौच धर्म कहलाता है

दस दिवसीय जैन पर्युषण पर्व के चौथे दिन शौच धर्म की पूजा की गई। पटना के मीठापुर, कदमकुआँ, मुरादपुर, कमलदह मंदिर गुलजार बाग सहित सभी दिगम्बर जैन मंदिरों में शौच धर्म की पूजा की गयी। सभी दिगम्बर जैन मंदिरों में सुबह से हीं पूजा करने हेतु श्रद्धालु मंदिरों में पहुँचने लगे। मंदिरों में श्रद्धालुओं ने भगवान् का अभिषेक किया एवं शांतिधारा के बाद शौच धर्म की पूजा की। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में भोपाल से पधारे ब्रह्मचारी डॉ शीतल जैन ने श्रद्धालुओं को शौच धर्म की पूजा करवाई जिसे सागर से पधारे संगीतकार अरविंद शास्त्री ने धुन में पिरोया। दिगम्बर जैन समाज द्वारा मनाया जानेवाला दस दिवसीय महापर्व पर्युषण के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की पूजा हुई। ब्रह्मचारी डॉ शीतल जैन ने बताया कि पर्युषण पर्व में आत्मा के दस स्वभाव पर कैसे विजय पाया जाए इसी को बताया जाता है। पर्युषण पर्व का चौथे दिवस ‘उत्तम शौच’ नामक दिवस है। व्यक्ति का लोभ पर विजय प्राप्त करना ही शौच धर्म कहलाता है। शौच धर्म पवित्रता का प्रतीक है। यह पवित्रता संतोष के माध्यम से आती है। ब्रह्मचारी जी ने बताया कि व्यक्ति शौच धर्म के द्वारा लोभ पर विजय प्राप्त करता है। लोभ कई तरह का होता है जैसे धन का लोभ, यश का लोभ, इन्द्रियों का लोभ आदि। आत्मा की शुद्धि के मार्ग में लोभ सबसे बड़ा अवरोधक है। लोभ के कारण ही हमारा असंतोष बढ़ता है , हमारी इच्छाओं की वृद्धि होती है। लोभ हमारे सभी सदगुणों को नष्ट कर देता है।

जैन मुनि आचार्य रत्न विशुद्ध सागर जी महाराज का सौच धर्म के सम्बन्ध में कहना है कि आकांक्षा, इच्छा मानवता के लिए बहुत बड़ा विष हैं। इच्छाओं की लता इतनी लम्बी होती है कि उसको जितना बड़ा वृक्ष मिल जाए उतना ऊपर चढ़ते चली जायेगी। जो लता वृक्ष पर चढ़ती है, वह एक छोटे से बीज से प्रारम्भ होती हैं और धीरे धीरे वृक्ष के अंतिम शाखा तक पहुँच जाती है वह और भी ऊपर चढ़ना चाहती है। वैसे ही मनुष्य की इच्छाएं भी बढ़ती जाती है। आशा की लता ने सबको जकड़ लिया है। किसी भी वस्तु का लोभ या लालच नहीं होना चाहिए। दिगम्बर जैन साधू के पास पिच्छि कमंडल और जिनवानी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता है..
तन को शुद्ध करना अलग बात है किंतु संतोष के जल से मन और जीवन को शुद्ध करना आज के शौचधर्म का सार है। अतः शौच धर्म का पालन कर हमें अपनी आत्मा को निर्मल बनाना चाहिए।एम पी जैन ने बताया कि आत्मा का सहज स्वभाव ही उसका धर्म होता है। आत्मा को निर्मल , पवित्र एवं शुद्ध बनाने की प्रेरणा उत्तम शौच धर्म देता है। शौच का अर्थ शरीर की शुद्धता नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धता होती है।
पर्युषण पर्व के पांचवें दिन शनिवार को उत्तम सत्य धर्म की पूजा होगी।

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Author: undekhilive

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