700 साल पुराने सिद्धपीठ में है 3500 साल पुराने पत्थरों से बनी मां काली की प्रतिमा…पढ़िए कंकाल काली का इतिहास

पटना। भारत के प्रत्येक राज्य में अनेकानेक मंदिर हैं। बिहार में भी प्रत्येक जिले में अनेक प्राचीन मंदिर हैं। इनमें कुछ सिद्धपीठ हैं। बिहार की राजधानी पटना के उपनगर पटना सिटी में ऐसा ही एक सिद्धपीठ है, जो काली मंदिर के नाम से विख्यात है। मंदिर में पूर्वाभिमुख अष्टभुजी महाकाली की लगभग 3500 वर्ष पूर्व काले पत्थरों से निर्मित प्रतिमा प्रतिष्ठित है। इसे श्मशान काली और कंकाल काली भी कहा जाता है। महाकाली को लोग इस नगर की अधिष्ठात्री मानते हैं ।

यह प्रतिमा सारे भारत में अद्भुत और अद्वितीय है । प्रतिमा में एक उल्लेखीय विशेषता यह है कि अन्य प्रतिमाओं की तरह इस प्रतिमा में काली की जिह्वा बाहर निकली हुई नहीं है । ओठ गोलाकार है । काली की मुद्रा से क्रोध नहीं झलकता है । लगता है, दुःख और खेद का भाव प्रगट होता है । कहा जाता है. इनका उदर (पेट-पीठ) नहीं है, इसलिए यह प्रतिमा हमेशा लाल कपड़े से ढंकी रहती है। प्रतिमा में आँख के स्थान पर गड्ढ़ा है । काली के बाएँ लक्ष्मी और दाएँ सरस्वती की प्रतिमा प्रतिष्ठित हैं। पैरों के नीचे भगवान शंकर लेटे हुए हैं । काली की प्रतिमा के समीप दक्षिण और मिट्टी के चबूतरे पर भैरव स्थापित हैं। मंदिर में भगवान शिव, भैरव और काली और योगिनी की भी प्रतिमाएँ हैं। मंदिर के दक्षिण महावीर जी की प्रतिमा है। प्रतिमा में महावीर जी कालनेमि को पैरों तले दबाए हुए हैं। मंदिर के बाहर, दक्षिण-पूर्व में एक शिवालय है, जिसमें शिव-पार्वती की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। इस प्राचीन काली मंदिर के मुख्य द्वार पर लकड़ी का बना सिंहद्वार प्राचीन काष्ठकला का उत्कृष्ट नमूना है । काली मंदिर के कारण ही इस मुहल्ले को कालीस्थान कहा जाता है। दर्शनार्थी को पटना साहिब स्टेशन से एवं पटना सिटी चौक से रिक्शा, टेम्पो आदि के जरिये मंदिर तक पहुँचना पड़ता है । दशहरा के अवसर पर विशेष भीड़ रहती है ।

यह मंदिर तंत्रसाधना के लिए सारे भारत में प्रसिद्ध था। कहा जाता है, यहाँ कभी एक विशाल पुस्तकालय था, जिसमें तंत्र साहित्य की अनेक दुलर्भ पुस्तकें थीं, जो प्रायः नष्ट हो चुकी हैं। मंदिर में शाहआलम द्वारा दी गई। बंदूक और तलवार भी हैं। सन् 1853 में नेपाल नरेश रण बहादुर शाह देवी दर्शन के लिए यहाँ आए थे। उन्होंने अष्ट धातु निर्मित एक विशाल और वजनदार घंटा दिया था। घंटे की घुडी चोरी हो जाने के कारण इसे बजाया नहीं जाता। आँगन में यह घंटा पड़ा रहता है। कालीस्थान का क्षेत्र पहले घने जंगल झाड़ से ढँका था । यहीं गंगा-सोन के संगमस्थल पर श्मशान था। इसीलिए यहाँ की काली को श्मशान काली भी कहा जाता है । यहाँ दूर-दूर से तंत्रसाधना के लिए केवल तांत्रिक ही आया करते थे। इसी के पास ‘दीरा’ मुहल्ला है । यह दियारा (नदी-तट) का ही परिवर्तित रूप है। नेपाल नरेश ने ही इस मंदिर की चहारदीवारी का निर्माण कराया था । 1905 ई. में पटना सिटी के ईश्वरी प्रसाद रईस ने मंदिर के मार्ग को चौड़ा और मंदिर के भव्य सिंहद्वार का निर्माण करवाया। पटना सिटी का यह प्राचीन ऐतिहासिक काली मंदिर आज जर्जर अवस्था में है। मंदिर के पुजारी ने इसके जीर्णोद्धार के लिए सरकार से अपील की है।

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Author: undekhilive

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