मित्रता करो तो कृष्ण और सुदामा जैसी : आचार्यश्री चंद्रभूषण

पटना। महावीर इंक्लेव एब्जीबिशन रोड में भागवत कथा के अंतिम दिन शुक्रवार को कृष्ण-सुदामा प्रसंग सुनने सैकड़ों श्रद्धालु इकट्ठा हुए। आचार्य श्री चंद्रभूषण मिश्र ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि मित्रता करो तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी। सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताए ही मदद कर दे। हालांकि आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गई है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है, तब तक मित्रता रहती है। जब स्वार्थ पूरा हो जाता है, मित्रता खत्म हो जाती है।

आचार्यश्री ने कथा आगे बढ़ाते हुए बताया कि सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर मित्र कृष्ण से मिलने द्वारकापुरी जाते हैं। जब वह महल के द्वार पर पहुंच जाते हैं, तब प्रहरियों से कृष्ण को अपना मित्र बताते हैं और अंदर जाने की बात कहते हैं। सुदामा की यह बात सुनकर प्रहरी उपहास करते हैं और कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण का मित्र एक दरिद्र व्यक्ति कैसे हो सकता है। प्रहरियों की बात सुनकर सुदामा अपने मित्र से बिना मिले ही लौटने लगते हैं। तभी एक प्रहरी महल के अंदर जाकर भगवान श्रीकृष्ण को बताता है कि महल के द्वार पर सुदामा नाम का दरिद्र व्यक्ति खड़ा है और खुद को आपका मित्र बता रहा है। द्वारपाल की बात सुनकर भगवान कृष्ण नंगे पांव ही दौड़े चले आते हैं और अपने मित्र सुदामा को रोककर गले लगाते हैं। उनके पैर धोते हैं और उन्हें अपने सिंहासन पर बैठाते हैं।

यह प्रसंग सुन उपस्थित श्रद्धालु भावुक हो गए। आचार्यश्री ने सुदामा चरित्र के माध्यम से लोगों को निःस्वार्थ भाव से मित्रता निभाने का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि भागवत कथा का रसपान करने से जन्म-मृत्यु के भय का नाश होता है। भगवान कृष्ण की लोक मानस को गौ पालन की प्रेरणा के संदेश को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि गौ दुग्ध, दही, मक्खन शरीर और बुद्धि को पुष्ट करते हैं, जिसके बल पर ही भगवान श्रीकृष्ण शत्रुओं का संहार करने में सफल रहे। आचार्यश्री ने बताया कि सुदामा का चरित्र हमें जीवन में आई कठिनाइयों का सामना करने की सीख देता है। इसलिए कोई भी विपत्ति आए तो घबराना नहीं चाहिए। भगवान की शरण में जाने से सारे कष्टों का समाधान हो जाता है। आचार्यश्री ने कथा के दौरान परीक्षित मोक्ष व भगवान सुखदेव की विदाई का वर्णन भी किया गया।

आचार्य श्री ने कहा कि श्री कृष्ण ने इतनी लीलाएं की लेकिन उन्होंने अपने जीवन को सामान्य ढंग से रखा है। रुक्मिणी का हरण किया था इसलिए अपनी बहन सुभद्रा का हरण करवाया और बहेलिया ने रामावतार में बलि को मारा था छुपकर। उसी बहेलिया ने एक बार भगवान श्री कृष्ण के चरण में बाण मारे। भगवान ने कहा है-जैसा व्यवहार व्यक्ति संसार के साथ करता है, संसार वाले उसके साथ भी वैसा ही व्यवहार करते हैं। तो श्रीकृष्ण का शरीर बहेलिया के बाण लगने से पूरा हुआ है। बाद में नीलमाधव के रूप में उनकी पूजा की गई है और वही कालांतर में जगन्नाथ पुरी में स्थापित हुए। इसलिए श्री कृष्ण का जीवन बड़ा ही आदर्श जीवन रहा है। उन्होंने भगवान रहते हुए भी साधारण मनुष्य की तरह जीवन जी करके यह बताया है कि हम साधारण ढंग से अपने कर्तव्य का निर्वाह करके समाज को नई दिशा दे सकते हैं।

आचार्य चंद्रभूषण जी ने भागवत के अंत में प्रणाम और नाम संकीर्तन उपदेश दिया। यही दो उपदेशक प्रणाम और भगवान के नाम का संकलन करें। अगर इन दो नियमों का व्यक्ति पालन करे तो कलियुग में विशेष परेशानी नहीं होगी। एमपी जैन ने बताया कि भागवत कथा के दौरान मुख्य यजमान हनुमान सहाय गोयल एवं प्रेमलता गोयल, बसंत लाल गोयल, मातादीन गोयल, गिरिराज प्रसाद गोयल, नंदलाल राजगढ़िया, पूर्व जिला जज रमेश रतेरिया, गणेश खेतरीवाल, विनोद अग्रवाल, रमेश चंद्र गुप्ता, शंकर प्रसाद अग्रवाल, दिनेश कुमार अग्रवाल, महेश जी मित्तल, विनोद चौधरी, महावीर प्रसाद अग्रवाल, विजय कुमार गुप्ता, राधेश्याम बंसल, डॉ. गीता जैन, डॉ. प्रमिला मोदी समेत सैकड़ों लोग पूरे समय मौजूद रहे।

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Author: undekhilive

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