प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार भी मिल चुके हैं कलाकारों को
सम्यक न्यूज़, पटना.
मिथिला पेंटिंग आज किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है. पारंपरिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के मिथिलांचल में यह विभिन्न समुदायों की महिलाओं द्वारा बनाई गई थी. आज यह व्यवसायिक रूप से विस्तृत होकर अमेरिका, यूरोप तक फैल चुकी है. इसमें पारंगत कलाकार आसानी से 10-12 हजार रूपये की कमाई कर लेते हैं. मिथिला पेंटिंग युक्त परिधानों की डिमांड लोकल मार्केट से लेकर विदेशों तक है. इसके जरिए महिलाएं घर बैठे कमाई कर सकती हैं. यही नहीं, अब तो रेलवे की बोगियों पर भी मिथिला पेंटिंग सजाई जा रही है.
मधुबनी के वार्ड चार स्थित सरस्वती नगर में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में पार्षद पंडित वेद व्यास ने डॉ प्रभात दास फाउण्डेशन के प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने कहा कि मिथिला पेंटिंग स्वरोजगार का रूप अख्तियार कर चुका है. महिलाएं इसे अपनी आजीविका का साधन बना सकती है. वस्तुतः मधुबनी कला मिथिला अर्थात् बिहार में प्रचलित एक लोक चित्रकला है. इसमें महिलाओं की अधिक भूमिका होती है .इसलिए इसे महिलाओं की चित्रशैली भी कहते हैं. उन्होंने कहा कि इसकी उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र के मधुबनी जिले से हुई है. यह भारतीय चित्रकला की एक शैली है जो विभिन्न प्रकार के औजारों से की जाती है जिसमें उंगलियों, टहनियों, ब्रश, निब-पेन और माचिस की तीली और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है. इसके अंतर्गत दो तरह के चित्र बनाए जाते हैं. प्रथम भित्ति चित्र मुख्यतः दीवारों पर ही बनाए जाते थे और यह इसकी प्रारंभिक अवस्था थी लेकिन, वर्तमान में मधुबनी चित्रकला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक हो गई है और खूब ख्याति बटोर रही है. अब तो यह भित्ति शैली से कागज, कपड़े तथा कैनवास पर भी उकेरी जाने लगी है. मधुबनी चित्रकला की प्रसिद्ध महिला चित्रकार हैं- सीता देवी, गोदावरी दत्त, भारती दयाल, बुला देवी आदि. इनमें से कुछ को तो प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार भी मिल चुके हैं.

पंडित वेद व्यास ने कहा कि मधुबनी कला की पाँच विशिष्ट शैलियाँ हैं: भरनी, तांत्रिक, गोडना और कोहबर. मधुबनी चित्रकला के दो रूप प्रचलित है एक भित्ति चित्र और दूसरा अरिपन चित्र. दरअसल मधुबनी पेंटिंग प्राचीन महाकाव्यों के लोगों और प्राकृतिक दृश्यों और देवताओं के साथ उनके जुड़ाव को दर्शाती हैं. मधुबनी पेंटिंग में शाही दरबार के दृश्य और शादी जैसे सामाजिक आयोजनों के साथ-साथ सूर्य, चंद्रमा और तुलसी जैसे धार्मिक पौधों को भी व्यापक रूप से चित्रित किया जाता है. मधुबनी पेंटिंग में कोई जगह खाली नहीं छोड़ी जाती है. खाली जगहों को फूलों, जानवरों, पक्षियों और यहां तक कि ज्यामितीय डिजाइनों से भर दिया जाता है.
प्रशिक्षिका रश्मि कुमारी ने बताया कि शिविर में मिथिला पेंटिंग के विविध स्वरूपों का ज्ञान 39 लड़कियों को दिया गया. बच्चियों को इसकी मार्केटिंग की जानकारी भी दी गयी है. संचालन अनिल सिंह ने किया. कार्यक्रम में राधिका कुमारी, रौशनी, लीली कुमारी, राखी, सोनी, कोमल, सुधा, मुस्कान, पायल, मनीषा, पिंकी, संध्या, अंजली, गुनगुन, पुष्पा कुमारी आदि मौजूद थी.
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