फोटो खिंचवाने या सेल्फी लेने के तुरत बाद हमारी मुस्कान गायब हो जाती है, क्यों? दरअसल चेहरा तो हमारे भीतर का आईना है। भीतर तनाव भरा रहेगा, तो चेहरे पर मुस्कान भला कितनी देर टिकेगी।
कुमार अनिल
भगवान महावीर की अंतिम देशना (उपदेश) पर आधारित ग्रंथ का नाम है उत्तराध्यन सूत्र। आचार्यश्री चंदना जी ने 50 साल पहले यह ग्रंथ लिखा, जिसका आज महत्व बढ़ गया है। यह मूलतः जीवन मंत्र है। महिला हो या पुरुष, युवा हो या बुजुर्ग, उसके भीतर आज जितना तनाव है, पहले नहीं था। इसीलिए सेल्फी लेते समय फोटो खिंचवाते समय चेहरे पर जो मुस्कान आती है, वह क्षण भर में छू-मंतर हो जाती है। आप वीरायतन जाएं और आचार्यश्री चंदना जी या साध्वी संघ की किसी भी साध्वी से मिलें, आप पाएंगे कि वे ऊर्जा से भरी हैं। आप फोटो खींचे या न खींचे, हमेशा उनके चेहरे पर मुस्कुराहट मिलेगी। इसकी वजह है कि वे भीतर तनावमुक्त हैं। राग-द्वेष के चक्र से बाहर निकल गई हैं। वे सबके कल्याण के लिए सोचती हैं, मैत्री भाव से भरी हुई हैं। क्या हम प्रयास करें तो हमारे भीतर का तनाव, राग-द्वेष, दूसरों के प्रति नफरत कम हो सकती है और हम भी प्रेम और मैत्री भाव की कुछ बूंदें अपने भीतर इकट्ठा कर सकते हैं? क्या हमारे भीतर-बाहर भी मुस्कान, शांति का थोड़ा अंश मिल सकता है?

इसके लिए उत्तराध्ययन सूत्र बड़े काम का है। इसे सभी को पढ़ना चाहिए। शोधार्थियों के लिए तो बेहद जरूरी है। यह हिंदी में है और सहज है। राजगीर स्थित वीरायतन की लाइब्रेरी में यह उपलब्ध है। 480 पन्नों के इस ग्रंथ में 36 अध्याय हैं। पहला है विनय श्रुत। इसी तरह जीवन के विभिन्न पहलुओं को खोला गया है और जीने की राह बताई गई है।
वाट्सएप पर रोज लोग अच्छी पंक्तियां, उपदेश भेजते हैं जो किताबी उपदेश जैसे लगते हैं। उन उपदेशों पर न भेजनेवाले ने विचार किया, जीवन में उतारा और न ही उसे प्रेषित करनेवाले रुक कर मंथन करते हैं। वाट्सएप के शब्दों ने अर्थ खो दिए हैं।
उत्तराध्ययन सूत्र आपको ढाई हजार साल पहले ले जाता है, भगवान महावीर से जोड़ता है। वर्तमान में यह आचार्यश्री चंदना जी से जोड़ता है। आप प्रयोग करके देखें, जैसे-जैसे आप पुस्तक में भीतर प्रवेश करते जाएंगे, जीवन का तनाव कम होता जाएगा, एक सुगंध, एक सुखद अनुभूति आपके भीतर भरने लगेगी।
उत्तराध्ययन सूत्र मूलतः जीवन जीने का तरीका बताता है। यह जीवन दर्शन है। इसलिए आज की भागती दुनिया में यह आम लोगों के बड़े काम का है।
पुस्तक शोधार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसे इसमें साधु-मुनि के गुण बताए गए हैं। 22 परिषह ( नकारात्मक भाव या कार्य) की चर्चा है। इससे मुक्ति के उपाय बताए गए हैं। इसी तरह साधुओं-मुनियों के लिए क्या उचित और क्या अनुचित है, इसकी विस्तार से चर्चा है।
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