थ्री नॉट थ्री…..फायर…. फुस्स ! ये कैसा गार्ड ऑफ़ ऑनर

सम्यक न्यूज़. पटना.

आपने “शोले” फिल्म तो देखी होगी न. उसमें कड़क मिज़ाज़ जेलर की भूमिका में हास्य कलाकार असरानी थे. एक सीन में वे कहते हैं- “हम अंग्रेजों के ज़माने का जेलर हैं.” बिहार पुलिस के पास भी इसी डायलॉग को दोहराने की वज़ह है. उसके पास भी अंग्रेजों के ज़माने की थ्री नॉट थ्री राइफलें अभी भी हैं. कितनी कारगर है – इसकी फ़िक्र नहीं. कमबख्त अक्सर धोखा दे जाती है. एक बार फिर वह धोखा दे गयी. वैसे बिहार पुलिस में “गार्ड ऑफ ऑनर” के दौरान रायफल का ऐन वक्त पर धोखा देना कोई नई बात नहीं है. ऐसे कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं. ताजा मामला मोतिहारी से सामने आया है. सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो गया जिसमें पूर्व मंत्री योगेंद्र पांडेय की अंत्येष्टि के दौरान “गार्ड ऑफ ऑनर” दिया जा रहा है. ऐन वक्त पर बिहार पुलिस की राइफलें फुस्स हो गईं. बहुत दिन नहीं हुए जब पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र के निधन पर उनके पैतृक गाँव में अन्तयेष्टि के समय सरकार की तरफ से उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाना था. ऐन वक्त पर वहां भी राइफल फुस्स हो गयी. बड़ी किरकिरी हुई. क्या इस बेअदबी से किसी ने कोई सबक लिया? उत्तर है- नहीं.

प्राप्त जानकारी के अनुसार पूर्व मंत्री योगेंद्र पांडेय के निधन के बाद मोतिहारी स्थित उनके पैतृक गांव में राजकीय सम्मान के साथ उनकी अन्तयेष्टि की जा रही थी. सलामी गारद के जवान पूरी तैयारी के साथ गार्ड ऑफ ऑनर देने के लिए घाट पर मौजूद थे. जैसे ही सलामी का आदेश हुआ, जवानों ने कंधे पर रखे रायफल से फायर करना शुरू कर दिया. इस दौरान कई जवानों के राइफल से फायर नहीं हुआ. ऐन वक्त पर राइफल फुस्स हो गयी. जिन जवानों के राइफल से फायर नहीं हुआ, वे फायर करने के लिए परेशान दिखे. पुलिस के जवान काफी देर तक राइफल से फायर करने की कोशिश करते रहे, लेकिन गोली नहीं चली. अंत में जवान राइफल कंधे पर लेकर खड़ा रहा. इसी दौरान वहां मौजूद किसी शख्स ने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया जो तेजी से वायरल हो गया.

अब जरा शस्त्रों की साफ़-सफाई और देखभाल पर गौर कीजिये. हर पुलिस लाइन में “आर्मर” होते हैं जिनका ड्यूटी शस्त्रों को कारगर बनाये रखने की होती है. जहाँ भी सशस्त्र जवान होते हैं, समय-समय पर वहां वहां “आर्मर” की ड्यूटी शस्त्रों की जाँच करने की होती है. उन्हीं के जिम्मे साफ़-सफाई और ग्रीसिंग भी होती है. एक संभावना तो ये भी बनती है कि या तो “आर्मर” अपनी ड्यूटी सही ढंग से नहीं कर रहा है या नयी व्यवस्था में उस पद को ही समाप्त कर दिया गया हो और शस्त्रधारी को ही ये काम भी करना पड़ता हो. खैर- इतना जरूर है कि बार बार ऐसा होने के बाद भी पुलिस प्रशासन रायफलों की देखभाल की व्यवस्था नहीं कर पा रही है और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए इस वीडियो ने एक बार फिर बिहार पुलिस की किरकिरी करा दी है.

मतलब वही गलती फिर दुहराई गयी. तो क्या ये मान लिया जाये कि गार्ड ऑफ ऑनर एक ऐसी परंपरा है जो बोझ बनती जा रही है. लाचारी में किसी तरह इसे ढोया जा रहा है. वैसे आजकल सबसे चर्चित राइफल AK 47 भी दूसरे विश्व युद्ध के समय की है मगर आज भी यह पुलिस से लेकर खूंखार अपराधियों की पहली पसंद है. बीच में सरकारी कंपनी आईओएफ ने “इंसास” राइफल बनाई मगर AK 47 का मुकाबला नहीं कर सकी. तो क्यों नहीं राजकीय सम्मान की लाज बचाने के लिए कारगर राइफलों से “गार्ड ऑफ ऑनर” दिया जाता है?

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Author: undekhilive

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