हम तो पसर गए, हटा सको तो हटा लो

श्यामनंदन कुमार

15 महीने पुरानी सरकारी रिपोर्ट के अनुसार राजधानी पटना के 342 तालाब गायब हो गए हैं . ये खबर न सिर्फ चौंकानेवाली बल्कि गंभीर भी है. मामला शहर के पूर्वी हिस्से में लगभग 18 एकड़ में विस्तृत गुणसागर तालाब का है जिसके 18 धूर का भी पता नहीं है. पूरे तालाब पर अवैध कब्ज़ा कर लगभग 600 पक्का मकान, मदरसा, मस्जिद और स्कूल बना दिए गए है,. ये हालत पटना की है जहाँ सरकार बहादुर अपने पूरे ताम-झाम के साथ विराजमान हैं . दूर-दराज़ इलाकों की तो बात ही छोड़ दीजिये. तालाबों को भर कर ज़मीन दखल कर लेने से जल संग्रहण की पुरानी व्यवस्था चौपट हो गयी और गंगा जैसी सदानीरा नदी के किनारे बसे पटना का भूमिगत जल स्तर हर साल घटता जा रहा है.

अब क्या करेगी सरकार ? क्या प्रशासन सरकारी ज़मीन पर अवैध रूप से बसे लोगों को उजाड़ देगा? है इतना सामर्थ्य ? राजधानी के पूर्वी इलाके भागवत नगर में ही सरकार की नज़र में अवैध रूप से बसे लोगों पर क्या -क्या जुल्म ढाए गए- यह इतिहास बन चुका है. इस तरह से ज़मीनों के अवैध कब्जे के मामले में सरकार कई बार सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खा चुकी है. कोर्ट सीधे पूछता है कि जब सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा किया जा रहा था तो आप कहाँ थे? प्रशासन क्या कर रहा था? उन ज़मीनों पर बसे लोगों को पानी, बिजली का कनेक्शन किसने दिया? वहां के बाशिंदों को नगरपालिका की सेवाएँ कौन दे रहा हैं? बस, सरकार चित्त. राजधानी के पॉश इलाका माने जाने वाला बुद्धा कॉलोनी भी नियम, नीति और कानून के साथ खिलवाड़ का ज्वलंत उदाहरण है. आवासीय उद्देश्य से एक सहकारी संस्था के रूप में गठित समिति ने नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए ज़मीनों की ऐसी बंदरबांट की कि सहकारी संस्था का मूल उद्देश्य ही गंगा में तिरोहित हो गया. आज वहां सैकड़ों आलीशान मकान बने है. अब सरकार ने इस मुद्दे को ही दफ़न कर दिया है.

अभी शहर के पश्चिमी हिस्से में (दीघा-राजीव नगर का इलाका ) लगभग 40 वर्ष पुरानी ज़मीन अधिग्रहण की आग फिर धधक उठी है और लोग अपनी ज़मीनों के कागजात ढूँढने में लगे हैं. धरना, प्रदर्शन का दौर जारी है. जान देंगे, ज़मीन नहीं देंगे जैसे नारे हवा में गूंज रहे हैं. दीघा के स्थानीय बीजेपी विधायक खुलेआम इनके साथ खड़े हो गए हैं. वे कहते हैं- अगर सरकार बुलडोज़र चलाएगी तो सबसे पहले मैं उसके आगे लेट जाऊंगा. लो कर लो बात. पटना सदर अंचल के अधिकारी जब ज़मीन की नापी कराने पहुँचते हैं तो स्थानीय महिलाएं हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर उनका रास्ता रोक लेती हैं और खूब नारेबाजी करती हैं. बेबस अधिकारी लौट आते हैं. पूरा मामला बिहार राज्य आवास बोर्ड द्वारा लगभग 40 वर्ष पूर्व दीघा-राजीव नगर इलाके में 1024.52 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण से जुड़ा है. मामला सुप्रीम कोर्ट से लौट चुका है जहाँ से सरकार को अपेक्षित न्याय नहीं मिला . इस इलाके में हजारों मकान बन गए. पूरा इलाका बड़ी कॉलोनी के रूप में आबाद हो चुकी है. ऐसे लोगों का तर्क है कि उन्होंने सीधे किसानों से ज़मीन खरीदी है. दूसरी तरफ सरकार द्वारा अधिग्रहित ज़मीनों का मुआवजा नहीं मिलने की बात कहकर किसानों ने अपने स्तर पर खरीद-बिक्री कर ली. सरकार अब 20 एकड़ ज़मीन चाहती है ताकि न्यायाधीशों के लिए आवास बनाये जायें. इस इलाके में पिछले 40 वर्षों में अनेक बार दोनों पक्षों की भिड़ंत हो चुकी है. लाठी चार्ज, आंसू गैस. फायरिंग धारा 144 जैसी सरकारी हमले लोग झेल चुके हैं. सरकार के लिए भी ये इलाका नासूर बन चुका है. राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी गर्म तवे पर स्वार्थ की रोटी सेंकने पहुँच जाते है.

दरअसल राजधानी पटना का विकास कितने भद्दे और अव्यवस्थित तरीके से हुआ है और निरंतर हो रहा है, इसे तो यहाँ के पुराने बाशिंदे ही महसूस करते हैं. रोजी-रोजगार, पढ़ाई-लिखाई, अस्पताल-दवाई के चक्कर में रोजाना यहाँ सात लाख से ज्यादा लोग (floating population) आते हैं और उनमें से हजारों यहाँ रुककर पसरते जा रहे हैं. हालत ये हैं कि इन्हें बसने के लिए ज़मीन कम पड़ रही हैं. राजधानी की इतनी सघन आबादी है कि साँस लेने के लिए पेड़ और खुली जगह भी कम पड़ गयी है. सरकार के पास न तो कोई आवासीय नीति है और न ही यहाँ की बढ़ती जनसँख्या के लिए जन सुविधाएं जुटाने का कोई प्लान. नतीजा- शहर की बदरंगी सूरत, सड़कों पर भयंकर जाम और हैरान-परेशान होते धक्के खाते लोग. लोग समझते हैं कि बिना प्रशासनिक शह और मिलीभगत के ऐसी घटनाएं नहीं होती हैं, परन्तु वे लचर प्रशासनिक तंत्र का आगे लाचार हैं.

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Author: undekhilive

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